मनुष्य ज़िंदगी भर इनके पीछे भागता हैं। Human Life is Running

मानव की प्रवृति कुछ ज्यादा पाने और उस अपनी ना पूरी हो सकने वाली महत्वाकांक्षाओं से भरी पड़ी है, हर मनुष्य किसी ना किसी रूप में इसके लिए भाग ही रहा है। इसका मतलब ये बिलकुल नहीं की वह अपनी कोई महत्वाकांक्षा को भूल जाए पर उसे एक सीमा तक बांध कर रखे और अपने जीवन को परिपूर्णता का भाव दे, जो उसे अपने सुखमय जीवन को जी सकने और खुश होने का एहसास दे सकें। साथ ही परमानद को प्राप्त कर सके।

एक जंगल में एक लोमड़ी रहती थी। अमूमन वह सुबह जल्दी जाग जाती थी, लेकिन उस दिन थोड़ा देर से जागी। लोमड़ी जैसे ही अपने घर से बाहर आई तो उसकी पूंछ सूरज की ओर थी। छाया सामने पड़ रही थी। छाया देखकर लोमड़ी को पहली बार अपने शरीर का स्वरूप पता चला।

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छाया में उसका रूप बहुत बड़ा दिखाई दे रहा था। तब लोमड़ी ने सोचा, क्यों ने किसी बड़े जीव का शिकार किया जाए। बस ! यही भ्रम में वह इतनी उतावली हो गई कि घने जंगल में बड़े शिकार की चाह लिए पहुंच गई।

सूरज अब तक सिर पर चढ़ आया था। लोमड़ी को भूख भी बहुत लग रही थी। उसने सोचा क्यों ना आज हाथी का शिकार किया जाए। भूखी लोमड़ी हाथी की तलाश में इधर-उधर भटकने लगी। वह थक गई और एक जगह आराम करने लगी। लेकिन आसमान में सूर्य की दिशा बदल चुकी थी।

लोमड़ी को उसकी छाया छोटी दिखाई दे रही थी। लोमड़ी ने सोचा कि मेरा आकार तो इतना छोटा है क्यों न अब मैं छोटे जीव का शिकार करूं, मेरे लिए तो एक मेंढ़क ही काफी है। मैं बेकार में छाया के भ्रम के चलते इधर-उधर भटक रही थी। उस जब इस बात का ज्ञान हुआ तो उसने अपने एक छोटा शिकार किया और भोजन के बाद एक गहरी नींद में किसी पेड़ के नीचे सो गई।

संक्षेप में:

इसका अर्थ है कि मनुष्य भी इसी तरह छाया रूपी अपनी इच्छाओं के पीछे जिंदगी भर भागता रहता है। जब उसे विवेक का ज्ञान होता होता हो तो उसका दृष्टिकोण बदल जाता है। और वो एक नई राह पर चल देता है। जिसका रास्ता सकारात्मक पथ पर ईश्वर के घर की ओर जाता है।

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